maa ki mamta story
मा का प्यार , ममता व उसकी महत्ता एक घटना से समझते है। उस दिन ट्रेन चार घंटे देरी से चल रही थी। सोनू वैसे ही घर से लड़-लड़ा कर निकला था, सो मम्मी ने जो पराँठे बना के रखे थे वो भी वह गुस्से में अपने बेग से निकाल कर चोरी-छिपे धीरे-से फ़्रिज पर रख आया था। चूँकि नाराज़गी घरवालों से थी पेट से तो नहीं; सो स्टेशन से चिप्स, बिस्किट के एक-दो पैकेट ले लिये थे और आधे लीटर की एक कोल्डड्रिंक की बोतल भी। किनारे की सिंगल सीट पर वो खिड़की की मोटी-आढ़ी लोहे की जालियों में मुँह घुसाए बैठा था और ठंडी हवा का आनंद ले रहा था जो उसके बालों को तितर-बितर कर रही थी। अभी उसका गंतव्य आने में सात-आठ घंटे थे और अब उसे रह-रह कर भूख लग रही थी जो बढ़ते वक़्त के साथ और बढ़ती जा रही थी। चूँकि वो जनरल का डिब्बा था तो उजाला होने तक आने वाले चने, उबले बेर, भेलपूरी और दस के दो समोसे वाले भी अब अपना सारा माल बेच चुके थे और उस डिब्बे में नहीं थे। जब ये सब आवाज़ लगा रहे थे, आ-जा रहे थे तब वो कान में इयरफ़ोन लगा चिप्स-बिस्किट, कोल्डड्रिंक के मज़े ले रहा था। अब कोई बड़ा स्टेशन भी नहीं आना था जहाँ से वो कुछ और खाने को ख़रीद सकता था। बगल की लंबी...